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Thursday, September 5, 2013

Axis

नाम दिया तुमने
फिर भी क्यूँ लगती
तुम्हे-मेरी पहचान अधूरी है

चाहतें हैं हज़ारों
उनको पाने की
क्यूँ- अरदास ज़रूरी है?

अपनी ही बच्ची
क्यूँ अपनो को
लगती- हर हाल अधूरी है

अपना लो बस
मैं जैसी हूँ
ऐसी भी, क्या मजबूरी है?

सब कुछ तो है
तेरी पहुँच के दायरे मे
फिर, कम्बख़्त क्यूँ दूरी है

माना हूँ किसी और जहाँ की
पर तुम पे टिकी
मेरी धुरी हैं.

Friday, May 31, 2013

...and the reason is You!

सांसो की डोर से
ज़िंदगी पिरो रखी थी
वो जाने किस जनम की
गिरह माँग बैठे

खुशी की वजह वो
उदासी भी उनसे
वो अपनी उदासी में
मेरे माथे पे शिकन की
वजह माँग बैठे

उनकी मय्यत पे
जनाज़ा हम अपना भी
सज़ा लेते,
जो वो मुझसे मेरे
जीने की वजह माँग बैठे


Monday, February 11, 2013

Incomplete chapter


इस सच और झूठ
की दुनिया के परे
एक और दुनिया है
जहाँ एक खली मैदान
तुम्हारे इंतज़ार में बैठी
मैं नादान
ये भी न समझी
की तुम तो
इसी सच और झूठ
का हिस्सा हो
जो भूल गयी कहीं
बस एक अधूरा किस्सा हो 

Friday, June 22, 2012

Shayad

एक वक़्त था जब..

इन आँखों में
हज़ार सपने
पल में उबला करते थे

अनजान राहों पे 
चलते-बेवजह 
मुस्कुराया करते थे

एक झलक की तरस में,
रातें 
करवटों में काटा करते थे

तुम्हारी सासों की 
रफ़्तार में, 
अपनी सासें बाँधा करते थे

राशन जो लगी थी,
आहें भी 
ख़ामोशी से भरते थे

दर्द में कशिश थी ऐसी 
की हर सांस 
तुम पर मरते थे

हाय! प्यार सा कुछ,
शायद
हम तुमसे करते थे


p.s: ये कल की ही बात है ;)

Tuesday, March 27, 2012

Kasturi

एक शाम यूँ हीं
उस आईने में
धुंधली तस्वीर सी बनती है
सहमी सी, ठहरी सी
खुद के सवालों में
उलझी सी
एक आह छुपी
झिझकी सिरहन में
चाह छुपी
वो सूर्ख़ राख़ सी दहकती है
कल जाने क्या होना है
क्यों जाने क्या खोना है
अपनी तलाश में 
ग़ुम खोयी
वो कस्तूरी सी लगती है

Sunday, October 23, 2011

Un-done

रेत के घरोंदे
फिसलते बंद मुट्ठी से
धीमी आंच पे
जलती ख्वाहिशें 
बेपरवाह-ए-अंजाम
चंद मंसूबे
खुरचन से ख्वाब
सीलन पड़ी दीवारों से
उड़ते रंग, चड़ते साल
बनते बिगड़ते हर काम
इस साल की 
अधपकी फसलों के नाम....

Saturday, September 10, 2011

Mukaam- मुक़ाम

कुछ बातें, कुछ रातें
एक पल, एक सदी
ख़ामोशी की चाशनी
कहीं रिसता पानी,
कहीं एक नाम
वो ढलती सी शाम
एक मेरा नाम
गूंजता सा
ठहरा सा
और ये मुक़ाम..

Thursday, August 4, 2011

याद- Yaad


उठती गिरती लहरों में,
खट्टे मीठे पहरों में,
शामों में सहरों में,
अलसाये दोपहरों में....
पतझड़ में , बहारों में,
जो भूल बैठी,
बचपन के उन पहाड़ों में....
दिल की बस्ती में, शहरों में,
मूरत बने पत्थरों में...
मंदिर में , मजारों में,
उन लम्बी ठहरी कतारों में,
आसमां से झांकते तारों में,
छोटी सी जीत,
बड़ी हारों में...
उन हजारों इशारों में,
अनकही इकरारों में,
खुद से कर बैठी,
यू ही, उन करारों में....
एक तस्वीर तुम्हारी,
दिल की दीवारों में....
एक एहसास तुम्हारा,
मुझसे लिपटी,
करवटें लेती चादरों में....
बुझते -जलते, मिटले बनते,
धुंधले चेहरों में...
एक तुम हो,
जाने कितने हजारों में...
एक हँसी तुम्हारी,
इन बाहों की हारों में...
एक याद तुम्हारी,
मेरी नज़र के किनारों में....

Thursday, June 30, 2011

Gaanth- गांठ

छनकती, छिटकी चांदनी
झांकती चटके कांच से..
सुलगती, सीपती, शबनमी,
बीती रातों की आंच पे.....

बिखरी बातों की उलझनें,
कटी डोरी जो मांझ से..
गिरते उमंग की खिरचें,
खिंचती, मिटती हर साँझ में...

गुमसुम, गुमनाम चाहतें,
मन की गांठों में, फांस में..
तुमको पाने का इक फितूर,
अब भी है सुबह की झांस* में...


भूला, धुंधला धुन कोई
छुपा कहीं एक बांस में..
बन जाये वो बांसुरी,
आस बसी हर सांस में...

* locally used in hindi for the the sensorial one gets while using raw mustard oil/seed or while peeling onion. The buzz that it send to the head.

Sunday, May 1, 2011

Antardwand

A dying flame which flutters every time I go back in my mind. I wish I never had May 2010 in my calender...when I lost her. I had known her all my life. If I call her today she would pick up the phone and tell me she is still there but I know I can never reach her again.

I miss you D.


ज़िन्दगी की किताब के
पन्ने पलट गये
तुम क्या गये
हम बदल गये…

छिटकी चांदनी में
सिसकती रात और
अँधेरी सुबह के
आसमान बदल गये...

बारिश में जलती
सोंधी धरती,
ये सिहरती धूप,
हर मौसम बदल गये...

कोरी आँखों के
धुंधले सपने,
अपनों की अक्स के
चेहरे बदल गये...

हाथ बढाया तो
साथी छूट गये,
कदम बढाया
तो राह बदल गये...

तुम से मिल के भी
तुम से ना मिले,
तुम्हारी तस्वीर के
रंग बदल गये...

कुछ इस तरह
हर बात उलझी,
कि सच और झूठ के
मायने बदल गये...

काश वो दिन ना आते
जब बचपन बदल गये,
दिन बदल गये
अब तो साल भी बदल गये...

Saturday, April 16, 2011

Gulzaarish

आशिकी, आहें,
फ़लख फ़िक्र फानूस
ग़म की खुली खिड़की
खुशिया कंजूस

ज़िन्दगी गीली मोमबत्ती
सुलगते आबनूस
यादों की चिमटी
दूरियां मनहूस

ख्वाबों की फिल्म
रातें चापलूस
सुबह की चौंध
सच्चाई कारतूस

दिल की तिजोरी
प्यार महफूज
रिश्ते की भनक
दुनिया जासूस

बुनती कहानिया
थोड़ी मायूस
न फूल न पत्ते
बस घास फूस

Wednesday, February 16, 2011

बूँद





वक़्त की बारिश से
छिटकी एक बूँद.
यादों के दामन से
बंधी, छूटती बूँद

ज़िन्दगी के पन्नो में
अटकती, फिसलती सी
उन आँखों के आईने में
जहन की परछाई सी
ख़्वाबों के शामियाने में
अलसाई पड़ी बूँद

बचपन की चहक में
मां के आँचल में लिपटी सी
उन रात आँखों में
कभी थमी कभी टपकती सी
खुशियों की मीठी सुबह
घास पे नागे पाँव दौड़ती बूँद

बूँद- बूँद, पल- पल
उन धुंधली बीती यादों में
वक़्त की बारिश में
घुलती, ग़ुम होती बूँद

Wednesday, December 8, 2010

for you माँ..

जाड़े की सर्दी, धूप सुनहरी,
ठन्डे हाथ से हमें उठाना..
कच्ची नींद अचानक टूटती
तुम्हारा जोर से छीकना..
कपडे बिखरे यहाँ वहाँ,
उनको रोज समेटना...
खुली किताबें, आँखें सोयीं,
तीन कप चाय फिर बनाना...
टेढ़ी मुस्कान, नाक पे चश्मा,
घंटो बचपन की गप्पें लड़ाना...
यहीं रखा था-कहाँ गया फिर?
हर दिन कुछ ढूंढ़ना...
गर्म तवे पे जल्दी-जल्दी,
बिन चिमटे, रोटी सेंकना...
छुट्टियों के दिन अलसाए,
दिन भर लूडो खेलना...
वो हँसना, वो रोना,
बिन बात यू हीं,
मुझ से महीनो रूठना..
जाने कयू अब याद आता है,
माँ तुम्हारा डांटना!!!

Thursday, September 30, 2010

रातें


निशब्द बातें,
धुंधली यादें,
बोझिल नींद,
बचपन की चहक में
भूली बिसरी रातें ..

पानी की टिप-टिप,
घड़ी की टिक-टिक,
चिल्लाता सन्नाटा,
कुछ बनने की चाह में
जगती रातें...

खुशबू सोंधी- सोंधी,
बारिश हल्की- हल्की,
गर्म सांसें, ख्वाब पलछिन,
प्यार की सरगोशी
चुटकी में गुजरती रातें...

कचौटता बिस्तर,
टांडे पांव, ठंडी नाक,
नींद भरी आँखें,
जिदगी की ढलान पर,
लम्बी सर्द रातें...

Wednesday, September 29, 2010




अधखुली आँखों में
संजोये कुछ ख्वाब
रात की स्याही
और जिंदगी की किताब

धुंधला सा एक सच
पलकों के किनारे
दो बूँद पानी की
और दिल की गिरहें

ठहरी सी जिंदगी
जाने किस मोड़ पर
क्यूँ यादें भी नहीं बाक़ी
अब जहन की छोर पर

गुमसुम सी जिंदगी से
सवाल जाने कितने
टूटे भी नही टूटकर
कैसे थे वो सपने

इस रात के परे
नए सुबह की दस्तक
खुली आँखों से सपने
देखना बाक़ी है अब तक